My Rewiw & Point on Movie Of Sanju- Biopic Of Sanjay Dutt.

 
मंगलेश राव| फ़िल्म शुरू से ही लाजवाब हैं संजय दत्त का किरदार निभा रहे रणवीर कपूर ने इसे पर्दे पर बखूबी उतारा हैं। दोस्तो न ही मैं फ़िल्म समीक्षक हूँ और न ही फिल्मों का कोई जानकार किन्तु मुझे वर्षो में कोई एक फ़िल्म ही अच्छी लगती हैं मेरा झुकाव बायोपिक/आत्मकथा फिल्मो पर ज्यादा होता हैं फिल्मे हमारे समाज का आईना होती हैं। ओर संजू फ़िल्म ने भी समाज के विभिन्न पहलुओं को स्क्रीन पे प्रदर्शित किया हैं।

फ़िल्म का शुरुआती दौर संजू को एक गेरानुशाषित,भटका हुआ नॉजवाँ, ओर एक नशे का आदि युवक के रूप में बताया हैं। आज के समय के युवाओं के लिए बहुत ही सार्थक उदाहरण इस फ़िल्म के माध्यम से दिया गया हैं कि किस तरह युवा गलत संगतो के चलते नशे को अपना दोस्त और नशा सप्लाय करने वाले व्यक्ति को अपना हमसफर मानने की भूल कर बैठते हैं। किंतु बहरहाल इस फ़िल्म में अपने दृण निश्चय से नशे से कैसे छुटा जाए संजू का जीवन यहां बताता हैं जो आज के नशे के आदि युवाओ को "हर मैदान फतेह कर" लेने की प्रेरणा जगाता हैं। साथ ही एक कमलेश जैसा मित्र भी बनाने का सकारात्मक संदेश यहां साफ मिलता हैं जो हमे जीवन के कठिन समय पर ये बता सके की "तू शेर हैं शेर"'

नशे के छूटने के बाद संजय दत्त की लाइफ फिर पटरी पे आने लगती हैं। लेकिन, समय फिर करवट लेता हैं और संजय टाडा के आरोप से घिर जाते हैं असल कहानी और फ़िल्म का संदेश इसी घटना के आसपास घूमता हैं। झूटी पत्रकारिता,पुलिस/प्रसाशन के गलत रवैये के कारण न केवल संजय दत्त के जीवन मे कठिनाईयों का दौर शुरू होता हैं बल्कि उनके राजनेता पिता भी इस कठिनाईयों से झुझते दिखते हैं।


 फ़िल्म निर्माता ने संजय दत्त के अलावा इसमें सुनील दत्त की भूमिका पर भी खूब प्रकाश डाला हैं और दत्त साहब के जीवन के बारे में इस फ़िल्म से बेहतर और कोई विकल्प न होता होगा। जिसमे एक पिता अपने पुत्र के लिए राजनेता होते हुए भी दर-दर ठोकरे खाता हैं और अंत मे अपनी देह त्यागता हैं। इस फिल्म में दत्त साहब ओर संजय दत्त के रिश्तों को बताते हुए आज के हर पिता पुत्र के जीवन का चित्रण किया हैं जो वाकाई काबिले तारीफ हैं।

 कुल मिलाकर फ़िल्म झूटी पत्रकारिता पर सीधा कटाक्ष करती हैं ओर ये सच्चाई भी हैं कि आज की पत्रकारिता उस निचले स्तर पर चली आई हैं कि उन्हें दूसरे के जीवन,उनके परिवार या समाज की कोई चिंता नही हैं और अपनी पब्लिसिटी या यूं कहें कि TRP बढ़ाने के लिए मीडिया किसी के भी व्यक्तित्व पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाने से जरा भी परहेज नही करती।

 संजू फ़िल्म सही माईनो में एक मोटिवेशनल,रिश्तों को जोड़ने वाली,दोस्ती का सही अर्थ बताने वाली,युवाओ को सही प्रेरणा देंने वाली,बेफिक्री से जीना सिखाने वाली,झूठी पत्रकारिता को आइना दिखाने वाली तथा अंत मे उन लोगो को सीधा जवाब देने वाली हैं जो कुछ न कुछ बिना सोचे समझे दूसरे के जीवन पर अपना मत देते हैं और बिना तथ्यों के किसी के व्यक्तिगत जीवन पर उंगली उठाने वाले लोगों के मुह पर जोरदार तमाचा हैं फ़िल्म को देख के वाकियी ये एहसास होता हैं कि ये जीवन हैं और इसमें उतार चढ़ाव आते रहते हैं और इस जीवन का सही या गलत होना सिर्फ और सिर्फ हम पर निर्भर करता हैं न कि किन्ही अन्य लोगो पर क्योकि "कुछ तो लोग कहेंगे, लोगो का काम है कहना!" धन्यवाद,
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Manglesh Rao

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